भारतीय ज्ञान परम्परा के उज्ज्वल दीपस्तम्भ हैं ये कृतियाँ”- कुलपति प्रो बिहारी लाल शर्मा।

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में दो मौलिक ग्रंथों का भव्य लोकार्पण।

वाराणसी, 25 अप्रैल 2026 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति कक्ष में आज एक गरिमामयी एवं विद्वत्सभा-सुसज्जित समारोह में प्राकृत विभाग के आचार्य, पूर्व विभागाध्यक्ष एवं पूर्व श्रमण विद्या संकाय के संकाय प्रमुख प्रो. हरिशंकर पाण्डेय द्वारा रचित दो मौलिक एवं शोधपरक ग्रंथों-(अहिंसा इन ओरिएंटल स्ट्डीज)“प्राच्य अध्ययन में अहिंसा” तथा “चिन्मय गुरुदेव” -का भव्य लोकार्पण कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। समारोह में विद्वानों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति ने इसे एक ऐतिहासिक आयाम प्रदान किया।

लोकार्पण के उपरान्त अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. शर्मा ने इन कृतियों को भारतीय बौद्धिक परम्परा का सशक्त प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि “ये ग्रंथ मात्र पुस्तकें नहीं, अपितु भारतीय ज्ञान-संस्कृति के ऐसे दीपस्तम्भ हैं, जो वैश्विक स्तर पर शांति, सहअस्तित्व और अध्यात्म का आलोक प्रसारित करने में सक्षम हैं।” उन्होंने विशेष रूप से “प्राच्य अध्ययन में अहिंसा” की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें संस्कृत, प्राकृत एवं पालि वाङ्मय के आलोक में अहिंसा के सार्वकालिक और सार्वभौमिक स्वरूप का अत्यंत प्रामाणिक एवं प्रभावी प्रतिपादन हुआ है, जो विश्व समुदाय के लिए भारत का शाश्वत शांति-संदेश बन सकता है।

“चिन्मय गुरुदेव” पर विचार व्यक्त करते हुए कुलपति ने कहा कि यह ग्रंथ गुरुतत्त्व के गूढ़ विमर्श से लेकर जैन परम्परा में निहित प्रज्ञा तक, विविध आयामों को अत्यंत सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत करता है। “गागर में सागर” की उक्ति को चरितार्थ करता यह ग्रंथ ‘गुरु बिना ज्ञान नहीं’ की सनातन मान्यता को सजीव और मार्मिक अभिव्यक्ति देता है।

ग्रंथों के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते हुए कुलसचिव राकेश कुमार ने बताया कि “प्राच्य अध्ययन में अहिंसा” का आवरण स्वयं में एक सांस्कृतिक संवाद है।

श्रमण विद्या संकाय प्रमुख प्रो रमेश प्रसाद ने कहा कि यह आयोजन न केवल शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनरुत्थान एवं उसके वैश्विक प्रसार की दिशा में एक सशक्त कदम के रूप में भी स्मरणीय बन गया

अपने कृतज्ञता ज्ञापन में ग्रंथकार प्रो. हरिशंकर पाण्डेय ने इस उपलब्धि का श्रेय अपने गुरुओं एवं माता-पिता के आशीर्वाद को देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा के गूढ़ तत्वों को सरल, सुबोध एवं समकालीन भाषा में नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।

उपस्थित जन

इस अवसर पर कुलसचिव राकेश कुमार, परीक्षा नियंत्रक दिनेश कुमार, प्रो. रमेश प्रसाद, डॉ. रविशंकर पाण्डेय सहित प्राकृत, संस्कृत एवं दर्शन विभाग के अनेक आचार्य, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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