
वाराणसी। 6 मार्च शुक्रवार को दारानगर स्थित मरकज़ी शिया जामा मस्जिद में जुमा की नमाज़ के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई की याद में जलसे व मजलिस का आयोजन हुआ। जलसे का आग़ाज़ मौलाना सरताज हुसैन ने तिलावते कलाम पाक से किया। मौलाना ज़ाएर हसन ईमानी और मौलाना सैय्यद अमीन हैदर हुसैनी ने जलसे को ख़िताब करते हुए कहा कि आयतुल्लाह ख़ामेनेई सिर्फ़ कोई सियासी रहनुमा नहीं थे बल्कि वो पूरी दुनिया में रहने वाले शिया समुदाय के सबसे बड़े धर्मगुरु थे। उन्होंने मौत को ज़िल्लत की ज़िंदगी पर तरजीह दी और ज़ालिमों के ख़िलाफ़ अंतिम समय तक मोर्चे पर डटे रहे। उनकी शहादत की खबर सुनकर हर वो इंसान रोया जो उनसे मुहब्बत रखता था। जलसे की निज़ामत डॉक्टर शफ़ीक़ हैदर ने की। इस दौरान अमेरिका और इस्राएल के ख़िलाफ़ जम कर नारे बाज़ी की गई और भारत सरकार द्वारा विदेश सचिव को ईरान एम्बेसी भेजकर शोक संवेदना व्यक्त करने की प्रशंसा की गई साथ ही सरकार से मुतालेबा किया गया कि जल्द से जल्द अमेरिका और इस्राइल से अपने सारे रिश्ते तोड़ लेना चाहिए क्योंकि ये देश किसी के सगे नहीं है और वक़्त आने पर ये पीठ दिखाने वाले देश हैं। आखिर में मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना सैय्यद अक़ील हुसैनी साहब ने कहा कि ज़ालिम समझ रहा हैं कि अब ईरान की क़यादत करने वाला कोई नहीं बचा और अब हसको मिटा दिया जाएगा और घुटनों पर ले आया जाएगा लेकिन उनको मालूम होना चाहिये कि हम लोग इमाम हुसैन के रास्ते पर चलने वाले लोग हैं। इमाम हुसैन को शहीद करने के बाद यज़ीद भी यही सोच रहा था कि अब इस्लाम मिट गया लेकिन उसको नहीं मालूम कि शहीद का खून जब ज़मीन पर गिरता है तो एक नया इनकेलाब लाता है और हर दिल में ऐसी आग रौशन हो जाती है जिसकी रौशनी कभी मद्धिम नहीं पड़ती। जलसे में मौलाना शौकत अली, सैय्यद मुनाज़िर हुसैन मंजू, मातमदार बनारसी, अतश बनारसी, रिजवान बनारसी समेत बनारस की सभी मातमी अंजुमनों के सदस्य एवं शिया समुदाय के सैकड़ों लोग एकित्रत हुए। इस अवसर पर पुलिस विभाग भी अपने लाव लश्कर के साथ मस्जिद प्रांगण में मुस्तैद दिखा।
