
ऐतिहासिक भूमि राजगीर में स्थित विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय के पावन प्रांगण में विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित दो-दिवसीय वैचारिक एवं अकादमिक कार्यक्रम अत्यंत गरिमामय वातावरण में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस आयोजन ने नालंदा की उस गौरवशाली परंपरा को पुनः जीवंत किया जहाँ शून्यता से चेतना और चेतना से विश्व मानवता के लिए ज्ञान का प्रवाह हुआ।
भाषा और नालंदा परंपरा: हिंदी के संवर्धन और वैश्विक संवाद में विविध संस्थाओं की भूमिका पर रहा जिसमें देशभर से पधारे अनेक प्रतिष्ठित विद्वतजन विश्लेषक लेखक संपादक एवं शिक्षाविद सहभागी बने। विचार विमर्श के केंद्र में हिंदी को केवल एक भाषा नहीं बल्कि भारतीय चेतना संस्कृति और वैश्विक संवाद की सशक्त वाहिका के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर वक्ताओं के क्रम में हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रचार मंत्री एवं श्रीकुल पीठ के पीठाधीश्वर पूज्य श्री श्री 1008 डॉ. सचिन्द्र नाथ जी महाराज का विशेष उद्बोधन हुआ। अपने संबोधन में उन्होंने हिंदी भाषा के वर्तमान विकास, उसकी वैश्विक स्वीकार्यता तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन के 115 वर्षों के गौरवशाली इतिहास और उसके सशक्तिकरण पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आज हिंदी विश्वभर में 600 मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है तथा विज्ञान वाणिज्य चिकित्सा मीडिया प्रौद्योगिकी सहित लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है।
नालंदा विश्वविद्यालय में उपस्थित अनेक विशेषज्ञों विद्वानों एवं विचारकों ने एक स्वर में यह मांग रखी कि भारत की हिंदी भाषा को संयुक्त राष्ट्र में अधिकृत भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए क्योंकि आज हिंदी केवल भारत तक सीमित नहीं रही है। बल्कि विश्व के अनेक देशों में प्रवासी भारतीयों के माध्यम से हमारी संस्कृति जीवन दृष्टि और सनातन मूल्यों की संवाहक बन चुकी है।
कार्यक्रम के समापन सत्र में विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति डॉ. सचिन चतुर्वेदी ने सभी वक्ताओं विद्वानों सहभागी संस्थाओं आयोजकों विद्यार्थियों एवं कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त किया तथा भविष्य में हिंदी के वैश्विक संवर्धन और नालंदा परंपरा के पुनरुत्थान हेतु मिलकर और अधिक सशक्त कार्य करने का संकल्प व्यक्त किया।
यह दो-दिवसीय आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं बल्कि भारत की आत्मा की चेतना है और नालंदा की परंपरा के अनुरूप इसी चेतना के माध्यम से विश्व में ज्ञान करुणा और मानवीय मूल्यों का विस्तार ही हमारा सामूहिक लक्ष्य होना चाहिए।



