
हम राष्ट्रभावना के साधक हैं, हम तप के पथिक हैं, हम उस विचारधारा के प्रहरी हैं जिसने भारत को केवल भूभाग नहीं, बल्कि जीवंत राष्ट्र के रूप में देखा है।
हम मृदुभाषी हैं – क्योंकि हमारी संस्कृति ने हमें विनम्रता सिखाई है।
हम सरल हैं – क्योंकि हमारी जड़ें इस भारतभूमि की पवित्र मिट्टी में धँसी हुई हैं।
हम सहज हैं – क्योंकि हम सत्ता की सीढ़ियों से नहीं, समाज की सीढ़ियों से ऊपर आए हैं।
जिस विचार का बीज वर्षों पूर्व हमारी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रोपा था, उस बीज को असंख्य तपस्वी कार्यकर्ताओं ने अपने परिश्रम, त्याग और तपस्या के जल से सींचा।
वह बीज आज वटवृक्ष बन चुका है – विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक राजनीतिक शक्ति, भारतीय जनता पार्टी के रूप में।
और हमें गर्व है – कि उस वटवृक्ष की तीसरी पीढ़ी भी उसी निष्ठा उसी अनुशासन और उसी समर्पण के साथ राष्ट्र निर्माण में लगी है।
यह वह संगठन है जहाँ राष्ट्र प्रथम केवल नारा नहीं – जीवन का मूल मंत्र है।
यह वह धारा है जहाँ पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन केवल ग्रंथों में नहीं, नीतियों में जीवित है।
जहाँ अंत्योदय केवल विचार नहीं- अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास पहुँचाने का संकल्प है।
यहाँ व्यक्ति की पहचान जाति से नहीं, उसके कर्म और समर्पण से होती है।
यहाँ पद की आकांक्षा नहीं, दायित्व का निर्वहन सर्वोपरि है।
यहाँ सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास केवल शब्दों की माला नहीं – नीति और नीयत का प्रमाण है।
हम समाज को जोड़ते हैं, व्यक्ति को सशक्त करते हैं, संगठन को मजबूत करते हैं_
और भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने की दिशा में सतत संयमित और संगठित प्रयास करते हैं।
पीड़ा तब होती है जब वे लोग उपहास करते हैं-
जिन्होंने संघर्ष का मार्ग नहीं देखा,
जिन्होंने संगठन को जिया नहीं,
जिन्होंने अनुशासन का अर्थ नहीं समझा।
जिन्होंने बिना तप के परिणाम पाया-
वे हमें तप का पाठ पढ़ाने निकल पड़ते हैं।
जिन्होंने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का तप नहीं जाना।
माधव सदाशिव गोलवलकर का त्याग नहीं समझा।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान का इतिहास नहीं पढ़ा।
नानाजी देशमुख के ग्रामोदय के संकल्प को नहीं जाना —
वे जब हमें संगठन का अर्थ समझाने आते हैं, तब आश्चर्य भी होता है और पीड़ा भी।
जिन्होंने संघर्ष के दिनों में लाठियाँ नहीं खाईं।
जिन्होंने जेल की सलाखों के पीछे राष्ट्रगीत नहीं गाया।
जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी ध्वज को नहीं थामा —
वे आज प्रश्न करते हैं -आप भाजपा में कब आए?”
मैं उनसे स्पष्ट कहना चाहता हूँ —
मैं भाजपा में आया नहीं हूँ —
मैंने भाजपा को जिया है।
यह मेरे लिए दल नहीं – यह मेरा परिवार है।
यह मेरे लिए राजनीति नहीं -यह राष्ट्रसेवा का संकल्प है।
हमारे लिए सत्ता लक्ष्य नहीं- साधन है।
पद प्रतिष्ठा नहीं- उत्तरदायित्व है।
और संगठन केवल संरचना नहीं — संस्कार है।
जब तक इस राष्ट्रभूमि की धूल हमारे चरणों में लगती रहेगी,
जब तक भारत माता की जय का उद्घोष हमारे हृदय में गूँजता रहेगा,
जब तक राष्ट्र सर्वोपरि रहेगा —
तब तक हमारा समर्पण अडिग रहेगा।
हमारा संकल्प अटल रहेगा।
और हमारी यात्रा निरंतर चलती रहेगी।
विचार से व्यवहार तक —
संगठन से राष्ट्र तक —
हम प्रतिबद्ध हैं समर्पित हैं और सदैव तत्पर हैं।