Thursday, January 15, 2026
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31 दिसम्बर 1952 को मुफ्ती किफायतुल्लाह देहलवी महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी इस दुनिया से रुख्सत हुए।

भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
पार्ट 14
जलसों व जुलूसों से देशवासियों को मुल्क की आजादी के लिये तैयार किया।

मुफ्ती मौलाना किफ़ायतुल्लाह ने अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ाई में खुद भी हिस्सा लिया और आम मुसलमानों को उसमें शामिल करने के लिए समय-समय पर बयान, अपीलें और फतवे भी जारी किए इस तरह मदरसों में जिन्दगी गुज़ारने वाले बुजुर्गों ने अपने मुल्क को आजाद कराने के लिए अंग्रेजी शासन का खुले आम डट कर विरोध किया अपने प्रभाव से देशवासियों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उठ खड़े होने के लिए उनकी भावनाओं को उभारा आन्दोलनों, जलसों और जुलूसों में हिस्सा लेने के लिए अवाम को बेदार किया मुफ़्ती साहिब को प्रशासन के खिलाफ गतिविधियों और तकरीरें करने के जुर्म में 1930 में गिरफ्तार कर छः माह के लिए जेल भेजा गया पहले उन्हें दिल्ली जेल में रखा गया, बाद में गुजरात जेल भेज दिया गया जहाँ अन्य स्वतन्त्रता सेनानी खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान, डा. अंसारी, मौलाना हबीबुर रहमान, बैरिस्टर आसिफ अली पहले से ही जेल में बन्द थे, वहीं मुफ्ती किफायतुल्लाह को भी भेज दिया गया मुफ़्ती साहिब जेल से रिहा होने के बाद मदरसा अमीनिया में तालीम देते और उन्हें देश सेवा की प्रेरणा देते रहे उन्होंने मज़हब और देश की आज़ादी को अलग अलग नहीं समझा मज़हबी पाबन्दियों के साथ अपना जीवन गुज़ारते हुए देश की आजादी के संघर्ष करते रहना उन्होने अपना फर्ज समझा

हिन्दु- मुस्लिम एकता के पैगाम को आम किया

आजादी के मतवालों पर सख्ती करना, उन्हें जेल की सलाखों के पीछे ढकेलना, ब्रिटिश शासन का काम था जब कि आज़ादी के चाहने वाले अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते रहना अपना फ़र्ज़ समझते थे 1932 में फ़िरंगी शासन द्वारा कांग्रेस पार्टी को गैर क़ानूनी क़रार दे दिया गया, इसके विरोध में जब मुफ़्ती साहिब ने क़दम उठाया तो उन्हें 11 मार्च 1932 को दोबारा बन्द कर दिया गया इस बार उन्हें डेढ़ वर्ष के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई गई उस स्वतन्त्रता सेनानी ने देश की ख़ातिर उन सभी तकलीफ़ों को सहन किया देशवासी बगैर किसी धार्मिक भेदभाव के आजादी की लडाई मे सभी एक साथ थे जब मुफ्ती किफ़ायतुल्लाह को डेढ वर्ष के सश्रम कारावास की सज़ा के लिए जेल भेजा गया तो उनके साथ उनके हम वतन भाई स्वतन्त्रता सेनानी लाला देश बन्धु गुप्ता को भी जेल मे डाल दिया गया इस प्रकार से हिन्दुओं और मुसलमानों के आपसी ताल-मेल के साथ आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई जब भी एकता के साथ ब्रिटिश शासन का मुक़ाबला हुआ, वहां फ़िरंगी शासन को बहुत नुक़सान उठाना पड़ा इसी कारण अंग्रेज़ शासन ने हिन्दू-मुस्लिम एकता में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को अपनाये रखा मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह पर दोहरी ज़िम्मदारी थी पहला ईसाई मिशनरियों से मुस्लिम क़ौम को जागरूक करते रहना दूसरे, देश की आज़ादी की लड़ाई में समय समय पर रणनीति के अनुसार संघर्ष करते रहना इन्हीं कामों में वह सुबह से रात तक व्यस्त रहा करते थे

मुल्क की आजादी के लिये हर आन्दोलन मे हिस्सेदार रहे

उन्होंने देश को आज़ाद कराने के लिए कांग्रेस पार्टी के साथ अधिकांश आन्दोलनों में हिस्सा लिया चाहे वह गांधी जी का सत्याग्रह हो या भारत छोड़ो आन्दोलन चाहे प्रिंस आफ़ वेल्स के भारत आने का विरोध हो या साइमन कमीशन का बायकाट या सिविल नाफ़रमानी की तहरीक आज़ादी के सभी आन्दोलनों में मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह ने हिस्सा लेकर ये साबित कर दिया कि साधारण हिन्दू-मुसलमान ही नही, मुस्लिम उलेमा ए दीन,मौलानाओं, मौलवियों और मुफ्तियों के भी इस धरती पर खून के धब्बे उनकी वतन प्रेम और वफादारियों की दास्ताँ कह रहे है

अंग्रेज फिरंगियों के प्रस्ताव को ठुकराया

ब्रिटिश शासन ने हिन्दुस्तान को गुलाम बनाए रखने के लिए हर तरह की रणनीति अपनाए रखी थीं, जहा मौक़ा हुआ वहां दमन चक्र चलाया, जहां आवश्यक हुआ वहां आपसी टकराव करवाया, जहाँ लोभ लालच की गुंजाइश समझी वहां अपने मक़सद की पूर्ति के लिए लालच दे कर अपना काम निकाला जब अंग्रेजों ने यह महसूस किया कि मुफ्ती किफायतुल्लाह की गतिविधियां उनके लिए परेशानी और कठिनाइयां पैदा कर रही हैं, तो उन्होंने उस ईमानदार वतन प्रेमी को लालच के जाल में फांसना चाहा ब्रिटिश शासन ने यह समझा कि मुफ्ती साहिब मूलतः एक धार्मिक व्यक्ति हैं, उन्हें अपनी और अपनी क़ौम के दीन व ईमान की चिन्ता बहुत बेचैन किये रहती है, इसलिए उनका रुझान आजादी के संघर्ष से हटा कर केवल अपने धर्म के प्रचार-प्रसार तक ही सीमित कर दिया जाए इस संबंध में उन्होंने सोच-विचार के बाद वाइसराय कौंसिल के एक सदस्य के माध्यम से मुफ़्ती साहिब के पास एक खुफ़िया पत्र भेजा जिस में ब्रिटिश शासन की ओर से यह उल्लेख किया गया था कि आप अपनी राजनैतिक गतिविधियों से दूरी बना लें हम आपसे ब्रिटिश शासन के पक्ष में कोई प्रोपेगंडा कराना नहीं चाहते बस आज़ादी के संघर्ष में आप खामोशी इख्तियार कर लें इसके बदले में ब्रिटिश शासन द्वारा मदरसा सफ़दर जंग की आलीशान शाही इमारत और उसके आस-पास का लम्बा चौड़ा मैदान आपके जाती उपयोग के लिए बतौर गिफ़्ट आप के नाम कर दिया जायेगा मुल्क के उस वफादार, ईमानदार आज़ादी के मतवाले मुफ्ती ने शासन की उस लालच भरी दरखास्त को ठुकरा दिया उन्होंने अपने वतन की मुहब्बत और उसकी आजादी को सर्वोपरि रखते हुए फिरंगी शासन को जवाब दिया, कि मैं अपने वतन को आज़ाद कराने की लड़ाई अपने खुद के किसी फ़ायदे के लिए नहीं लड़ रहा हूं, यह मेरी अन्तर्रात्मा की आवाज़ है जिसे कोई भी लोभ या लालच दबा नहीं सकता इस तरह मौलाना मुफ्ती किफ़ायतुल्लाह ने अपने देश का सर गर्व से ऊंचा रखते हुए अपना पूरा जीवन बगैर किसी लोभ लालच के देश सेवा में गुज़ार दिया

आखिरी वक्त

आखिरकार अपनी जिन्दगी के 77 साल पूरा करके 31 दिसम्बर 1952 को इस दुनिया से रुख्सत होकर अपने रब से जा मिले मुफ्ती किफायत उल्ला की अपने वतन हिन्दुस्तान के लिये आजादी की लडाई मे दी गयी कुर्बानी सदा अमर रहगी

Dilshad khan
Watts up no
7652039883

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