संत कबीर दास जी के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर महंत विवेक दास जी को सम्मानित किया गया।

नव संस्कृति साहित्य संघ वाराणसी इकाई द्वारा निर्गुण संत साहित्य परंपरा की काव्य धारा के अग्रणी कवि संत कबीरदास के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर कबीर मठ के महंत आचार्य श्रद्धेय विवेक दास जी का नागरिक अभिनंदन दिल्ली से पधारे प्रो ओम प्रकाश सिंह सुरेन्द्र प्रताप डॉ श्रद्धानंद डॉ कवींद्र नारायण व्योमकेश शुक्ला संस्था अध्यक्ष डॉ संगीता श्रीवास्तव उपाध्यक्ष डॉ नसीमा निशा तथा सचिव बी एल प्रजापति ने उत्तरीय व अभिनंदन पत्र प्रदान कर के किया।

संस्था अध्यक्ष डॉ संगीता श्रीवास्तव ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि कबीर की सीख को सिर्फ पढ़ना ही नहीं बल्कि जीवन में धारण करना आवश्यक है। वे मानव के सच्चे हितैषी थे। उनका जीवन दर्शन मानव समाज के लिए प्रेरणास्रोत है उनका काव्य साहित्य समाज के आडंबरों कुरीतियों ढकोसलों को सिरे से नकारता है।

अभिनंदन पत्र का वाचन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कविंद्र नारायण ने किया।

वर्तमान साहित्य पत्रिका के संपादक

डॉ संजय श्रीवास्तव के उपस्थित न होने के कारण उनके अनुज अविनाश श्रीवास्तव ने अभिनंदन पत्र प्रदान किया। डॉ नसीमा निशा ने इस अभिनंदन पत्र का वाचन किया।

इं.राम नरेश नरेश पूर्व डिप्टी जनरल मैनेजर एन टी सी पी लिमिटेड ने अंग और स्मृति चिन्ह द्वारा विवेक दास जी का सम्मान किया।

कबीरदास की शिक्षाओं और विवेक दास के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपना वक्तव्य देते हुए डॉ श्रद्धानंद ने कहा आज भावुक क्षण है। क्योंकि आचार्य विवेक दास जी अपना सम्मान नहीं करते बल्कि सबको सम्मान देते हैं। काशी गुरु शिष्य परंपरा की नगरी है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण कबीर से लेकर विवेक दास हैं।

डॉ कवींद्र नारायण ने कहा आज हमारी

संस्था ने काशी की संत परंपरा को सम्मानित किया है। कबीर की प्रतिमूर्ति के रूप में विवेक दास को देख रहे हैं कबीर की परंपरा के अनुरूप आध्यात्मिक और साहित्य में अपना योगदान दे रहे हैं।

डॉ व्योमश शुक्ला ने कहा कबीर जैसा संत स्वभाव किसी विरले के पास ही हो सकता है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व समाज के लिए प्रेरणास्रोत है। उनकी दृष्टि वैज्ञानिक और चेतना क्रांतिकारी है।

इसी संदर्भ में उमेश कबीर ने कहा आचार्य जी का व्यक्तित्व किसी भी तरह के अंधानुकरण विरोधी के रूप में निखर कर सामने आता है। उनकी छवि एक ऐसे कर्मठ जुझारू और संघर्षशील संत की रही है जो सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों पर प्रखर दृष्टि रखते हैं।

प्रथम सत्र के अंत में महंत विवेक दास जी ने संस्था और कबीर पंथियों को अपना आशीर्वाद देते हुए कहा कि

कर्मकांड छोड़कर कबीर दास के रास्ते को अपनाओ।

द्वितीय सत्र में कबीर का लोक पर संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डॉ राम सुधार सिंह ने कहा कबीर भारतीय चिंतन परंपरा के स्वाभाविक विकास की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। कबीर को समग्रता में समझने के लिए उनके समय और उनकी लोकार्पित को समझना होगा। कबीर अपने समय के सर्वाधिक जागरूक और संवेदनशील प्राणी थे।इसलिए उन्होंने में व्याप्त हर प्रकार की विसंगतियों और कुरीतियों का विरोध किया।

प्रो अनुराग यादव ने कहा कबीर का वैचारिक संवाद और यात्राओं ने लोक की समझ को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कबीर का लोक कई अर्थों में आम धारणा और समझ से परे व्यापक और विशिष्ट है इसे जानना तभी संभव है जब हम कबीर के वैचारिक संवाद से रु -ब – रू होते हैं।

प्रो साधना भारती ने कहा संत कबीरदास का साहित्य आज के इस तकनीकी युग में अत्यधिक प्रासंगिक है लोकजीवन में घटित घटनाओं संस्कृतियों को कबीर के साहित्य में बहुत ही सहजता से देखा जाता है। पाखण्ड आडम्बर एवं कुरीतियों पर कुठाराघात करती साखी सबद और रमैनी साहित्य व समाज के लिए अनूठी धरोहर है जिसे हमें अपने जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है।

डॉ प्रीति त्रिपाठी ने कहा कबीर का लोक दर्शन मूलतः तर्क श्रम और विद्रोह पर आधारित है। कबीर नेआध्यात्मिकता को मंदिर और मस्जिद के बंद घेरों से मुक्त कर उसे जुलाहे के करघे कुम्हार के चाक और किसान के खेत में प्रतिष्ठित किया है।

कबीर के यहाँ कार्य ही प्रार्थना है। उन्होंने श्रम को केवल आजीविका नहीं बल्कि एक उच्च सौंदर्यबोध और साधना के रूप में परिभाषित किया।

शास्त्रीय ज्ञान के बोझिल कूप जल के विरुद्ध कबीर की लोक भाषा बहते नीर की तरह प्रवाहित होती है जो समाज के बौद्धिक पाखंड को अपनी उलटबासियों के माध्यम से चुनौती देती है।

कबीर का बेगमपुरा एक ऐसे आदर्श समाज का प्रतीक है जहाँ दुःख का लेश नहीं है और जहाँ मनुष्य जाति एवं धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर अपने वास्तविक सत्य को प्राप्त कर सकता है।

शोध छात्रा प्रज्ञा पांडेय ने कहा लोक में व्याप्त ऊँच नीच और जातिवाद को कबीर ने जड़ से नकारा। उनका मानना था कि ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं। उन्होंने एक समतामूलक समाज की कल्पना की जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से हो न कि उसके जन्म से।

कबीर का लोक केवल ग्रामीण जनता तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह सार्वभौमिक है। उन्होंने किताबी ज्ञान मसि कागद छुयौ नहीं के बजाय आँखिन देखी सत्य पर बल दिया। आज भी जब समाज सांप्रदायिकता जातिवाद और दिखावे में उलझता है तो कबीर के विचारों द्वारा निर्मित लोक हमें सही रास्ता दिखाता है।

​वे सही अर्थों में लोक नायक और युग पुरुष थे।

कार्यक्रम के अंत में संगीता कुमारी और मधु सिंह के निर्देशन में संत कबीरदास नामक भावपूर्ण नृत्य नाटिका का मंचन देख सभी भावविभोर हो उठे।

उपस्थित विद्वत श्रोताओं में प्रो सुरेन्द्र प्रताप वरिष्ठ कवि सुरेंद्र बाजपेई डॉ अशोक सिंह संतोष कुमार प्रीत आनंद कृष्ण श्रीवास्तव मासूम उमा तथा तमाम कबीर संप्रदाय के भक्तगण थे।

धन्यवाद ज्ञापन संस्था उपाध्यक्ष डॉ नसीमा निशा ने किया तथा संगोष्ठी का संयोजन डॉ श्रद्धानंद और कार्यक्रम का संयोजन बी एल प्रजापति ने किया

 

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