समाज को ईमानदार व वास्तविक ज्ञान देना ही शोध का लक्ष्य : प्रो. बंशीधर पाण्डेय 

सामाजिक विज्ञान शोध का बैकबोन होता है डाटा : प्रो. अभिजित सिंह

 

वाराणसी। महामना मदनमोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ द्वारा आयोजित एवं भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद आईसीएसएसआर शिक्षा मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी शोधार्थियों के लिए शोध पद्धति और अकादमिक लेखन विषयक दस दिवसीय शोध पद्धति पाठ्यक्रम के पांचवे दिन गुरुवार को साइटेशन स्टाइल साहित्यिक चोरी प्रदत्त के प्रकार तथ्य संकलन इथिक्स एवं अकादमिक लेखन आदि आदि विषयों पर व्याख्यान हुआ। डॉ. भगवान दास केन्द्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित कार्यशाला के प्रथम सत्र के मुख्य वक्ता महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के डीन अकादमी प्रो. बंशीधर पाण्डेय साइटेशन स्टाइल एवं साहित्यिक चोरी पर विस्तृत व्याख्यान दिया। प्रो. पाण्डेय ने कहा कि साइटेशन और संदर्भ देना शोध कीअकादमिक विश्वसनीयता को बढ़ाता है। यह शोध को आधार देता है और शोधार्थी की शैक्षिक गुणवत्ता प्रमाणित होती है। साथ ही यह शोध के गुणात्मक मापन का आधार है एवं शोध के लिए यह अति आवश्यक होता है। उन्होंने कहा कि साइटेशन और संदर्भ के विभिन्न प्रचलित तरीकों को शोधार्थियों के बीच स्पष्ट किया। साहित्यिक चोरी को स्पष्ट करते हुए कहा कि प्लेज़रिज़्म जांच उपकरण शिक्षा के मित्र हैं दुश्मन नहीं। उन्होंने प्रतिभागियों को शोध में इससे बचने का भी सलाह दिया।

प्रबंधन अध्ययन संस्थान काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. अभिजित सिंह से डाटा कलेक्शन और वर्गीकरण विषय पर व्याख्यान दिया। प्रो. सिंह ने कहा कि डाटा सामाजिक विज्ञान शोध का बैकबोन होता है। डाटा शोध की समस्या को दूर करने के साथ सरकार व संगठनों के लिए नीति बनाने में भी सहायक होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी शोध में डाटा प्रामाणिक व प्रासंगिक होना चाहिए।

कार्यशाला के अंतिम सत्र में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रबंधन अध्ययन संस्थान के डॉ. राजकिरन प्रभाकर ने शोध नैतिकता और अकादमिक लेखन विषय पर चर्चा की। शोध में नैतिकता और अकादमिक लेखन के महत्व को बताते हुए कहा कि यदि संसाधन सीमित भी हो तो भी शोधकर्ता अपने डेटा में नवीनता ला सकता है बशर्ते उसका दृष्टिकोण ईमानदार और सत्यनिष्ठ हो। वही वास्तविकता और सत्यनिष्ठा स्वयं में एक उच्च नैतिक मूल्य है। शोध केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं बल्कि सत्य की खोज है। उन्होंने जोर देते हुए कहा जब आपको कोई नहीं देख रहा हो तब भी आप सच्चे बने रहें यही वास्तविक एथिक्स है।

उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं को केवल अकादमिक नियमों का ही नहीं बल्कि मोरल एथिक्स का भी पालन करना चाहिए। उन्होंने डेटा नैतिकता और अकादमिक लेखन एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। डॉ. प्रभाकर ने कहा कि स्वयं और समाज दोनों पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान मे रखकर शोध करना चाहिए। शोध के प्रत्येक चरण में शोध नैतिकता का अगर ध्यान रखा जाए तो शोध का समाज पर निश्चित रूप से सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

विषय प्रस्तावना एवं स्वागत पाठ्यक्रम निदेशक एवं महामना मदनमोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह तथा संचालन व धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चन्द्रशील पाण्डेय ने किया। इस अवसर पर प्रो. रजनीश रत्ना डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय डॉ. संजय सिंह डॉ. श्रीराम त्रिपाठी डॉ. प्रभा शंकर मिश्र डॉ. मनोहर लाल अरविंद मिश्र गुरू प्रकाश सिंह देवेन्द्र गिरि गणेश राय आकाश सिंह सपना तिवारी डाली विश्वकर्मा अतुल उपाध्याय पुलकित स्तुति समर मनीष हर्ष आदि उपस्थित रहे।

 

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