क्लाइमेट एजेंडा की रिपोर्ट में दावा साइकिल और बसों के परिचालन से ही थमेगा क्लाइमेट चेंज का पहिया।
आईआईटी बीएचयू में हुआ रिपोर्ट-लोकार्पण पटना और लखनऊ के परिवहन उत्सर्जन पर पहली बार आया ठोस आंकड़ा।

23 अप्रैल 2026 को आईआईटी बीएचयू वाराणसी के सिविल अभियांत्रिकी विभाग के सभागार में निम्न-कार्बन गतिशीलता की ओर: लखनऊ और पटना में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन न्यूनीकरण की संभावनाएं विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन हुआ। इसमें पटना और लखनऊ शहरों के परिवहन क्षेत्र से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर दो महत्वपूर्ण तकनीकी रिपोर्ट लोकार्पित किए गए। यह कार्यशाला प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक चली और इसे आभासी सतत विकास केंद्र तथा आईआईटी बीएचयू के सिविल अभियांत्रिकी विभाग का सहयोग प्राप्त था।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में आईआईटी बीएचयू के कार्यकारी निदेशक प्रो निलय कृष्ण मुखोपाध्याय, वर्चुअल सेण्टर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के अध्यक्ष प्रो विकास कुमार दुबे, सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्याक्ष प्रो के के पाठक, रिसर्च और डेवलपमेंट विंग की प्रमुख प्रो आभा मिश्रा मौजूद रहे। उद्घाटन सत्र के बाद प्रथम सत्र में क्लाइमेट एजेंडा दोनों रिपोर्ट का लोकार्पण किया गया। इस सत्र में वाराणसी स्मार्ट सिटी मिशन के चीफ जनरल मैनेजर श्री अमरेन्द्र तिवारी, सह-प्राध्यापक आईआईटी बीएचयू डॉ. अभिषेक मुद्गल, क्लाइमेट एजेंडा की निदेशक सुश्री एकता शेखर और एन्वायरोकैटेलिस्ट्स के संस्थापक सुनील दहिया ने परिचर्चा में भाग लिया। दोपहर बाद हुए दुसरे सत्र में डॉ. राजहंस नेगी, डॉ. सैमुअल चेरैन और डॉ. वेरेड ब्लास ने विद्युत वाहन, कार्बन लेखांकन और सतत गतिशीलता पर व्याख्यान दिए।
दोनों रिपोर्ट के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। लखनऊ में वर्ष 2025 में परिवहन क्षेत्र का कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 15.8 लाख मीट्रिक टन आंका गया है, और इसमें सबसे बड़ा हिस्सा डीजल ट्रकों का है जो अकेले 56 प्रतिशत प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। पटना में स्थिति और भी गंभीर है, जहाँ 2030 तक केवल डीजल ट्रक 7,54,580 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करेंगे। दोनों शहरों में वाहन प्रदूषण की यह तस्वीर स्पष्ट करती है कि जिस वाहन को हम अक्सर नजरअंदाज करते हैं, वही सबसे बड़ा दोषी है। इसके साथ ही दोनों रिपोर्टें यह भी बताती हैं कि यदि केवल 10 प्रतिशत लोग छोटी दूरी के लिए साइकिल अपना लें और दो-पहिया वाहनों का 80 प्रतिशत विद्युतीकरण हो जाए तो दोनों शहर मिलकर लाखों मीट्रिक टन उत्सर्जन में कटौती कर सकते हैं।

इन दोनों रिपोर्ट को हरित सफ़र अभियान के तहत क्लाइमेट एजेंडा ने प्रायोजित किया था, यह अभियान उत्तर प्रदेश एवं बिहार राज्य में सक्रिय है जहां अभियान का प्रयास है कि सभी टियर 2 और टियर 3 शहरों में स्वच्छ एवं समावेशी शहरी परिवहन को बढ़ावा दिया जाए। शोध और विश्लेषण का कार्य एन्वायरोकैटेलिस्ट्स और आईआईटी बीएचयू ने संयुक्त रूप से किया।
यह रिपोर्ट स्थापित करता है कि बिना स्थानीय साक्ष्य के शहरी परिवहन नीतियाँ बनाना नए जलवायु और सामाजिक जोखिम पैदा कर सकता है। पटना और लखनऊ से शुरू हुआ यह प्रयास अब देश के अन्य शहरों के लिए एक नीति-आधारित आदर्श प्रारूप बनने की दिशा में अग्रसर है।
लखनऊ और पटना की रिपोर्ट्स के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:
चिंताजनक तथ्य:
लखनऊ में 2025 में परिवहन क्षेत्र से कुल 15.8 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हो रही है, और इसमें सबसे बड़ा हिस्सा डीजल ट्रकों का है जो अकेले 56 प्रतिशत प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं, यानी शहर की हवा का आधे से अधिक बोझ उन वाहनों पर है जो माल ढोते हैं, लोग नहीं।
पटना में 2030 तक केवल डीजल ट्रक 7,54,580 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करेंगे। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि जिस वाहन को नीति निर्माता अक्सर नजरअंदाज करते हैं, वही शहर के सबसे बड़े प्रदूषक के रूप में सामने आया है।
लखनऊ में 2030 तक दो-पहिया वाहन अकेले 3,59,357 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करेंगे। शहर में दो-पहिया वाहन कुल यात्राओं का 42 प्रतिशत हिस्सा हैं, और इनकी संख्या तथा उपयोग दोनों लगातार बढ़ रहे हैं।
पटना की जनसंख्या 2025 में लगभग 26-27 लाख है और 2030 के प्रारंभिक वर्षों तक यह 32 लाख से अधिक हो जाने का अनुमान है। बिना किसी नीतिगत हस्तक्षेप के यह जनसंख्या वृद्धि सीधे तौर पर ईंधन खपत, वाहन पंजीकरण और कार्बन उत्सर्जन में और तेज बढ़ोतरी का कारण बनेगी।
उम्मीद की किरण:
लखनऊ में पहले से 24.5 प्रतिशत लोग साइकिल चलाते हैं। यदि केवल 10 प्रतिशत और लोग छोटी दूरी के लिए साइकिल अपना लें तो अकेले लखनऊ में 35,935 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड की बचत हो सकती है, और इसके लिए किसी बड़ी तकनीक की नहीं, केवल सुरक्षित साइकिल पथ और मजबूत इरादे की जरूरत है।
पटना में दो-पहिया वाहनों के 80 प्रतिशत विद्युतीकरण से 1,45,424 मीट्रिक टन और लखनऊ में इसी लक्ष्य को हासिल करने से 2,87,486 मीट्रिक टन उत्सर्जन घटाया जा सकता है। दोनों शहरों को मिलाकर यह कटौती लगभग 4,32,910 मीट्रिक टन तक पहुंचती है, जो एक असाधारण अवसर है।
लखनऊ में बेहतर उत्सर्जन मानकों के कारण 2021 से 2025 के बीच सीएनजी बसों का उत्सर्जन 37,462 मीट्रिक टन से घटकर 34,461 मीट्रिक टन हो गया, जबकि इस दौरान बसों की संख्या और परिचालन दोनों बढ़े। यह साबित करता है कि सही तकनीक और नीति मिलकर बिना यात्री सेवा घटाए प्रदूषण कम कर सकती है।
पटना में यदि 10 प्रतिशत दो-पहिया उपयोगकर्ता साइकिल की ओर स्थानांतरित हों तो 18,178 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड की बचत होगी। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पटना में पहले से 15.3 प्रतिशत लोग साइकिल का उपयोग करते हैं, यानी यह बदलाव जमीन से उगना शुरू हो चुका है, उसे केवल सींचने की जरूरत है।