श्री नीम करौली बाबा स्थापना दिवस पर श्रीमद्भागवत कथा में जीवन के चार आश्रमों का दिव्य संदेश।

वाराणसी। बरईपुर सारनाथ स्थित बाबा नीम करौली आश्रम में श्री सनातन जागृति शक्तिपीठ ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित श्री नीम करौली बाबा के पाँचवें स्थापना दिवस के पावन अवसर पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा का छठा दिन अत्यंत आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धक रहा। कथा व्यास पूज्य पंडित श्री आलोक कृष्ण जी महाराज ने श्रद्धालु श्रोताओं को जीवन के चार आश्रमों का गूढ़ एवं प्रेरणादायक ज्ञान प्रदान किया।महाराज श्री ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों—ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास—में विभाजित किया गया है। जीवन के प्रारंभिक 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम के होते हैं,जिसमें युवा पीढ़ी को शिक्षा,स्वास्थ्य और संयम पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यही जीवन की मजबूत नींव है,जो भविष्य के उज्ज्वल निर्माण का आधार बनती है,26 से 50 वर्ष की आयु गृहस्थाश्रम की होती है,जिसमें व्यक्ति को परिश्रम,ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ परिवार का भरण-पोषण करना चाहिए। इसके बाद 51 से 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम आता है,जहां व्यक्ति को समाज और राष्ट्र के हित में अपनी शक्ति,धन और बुद्धि का सदुपयोग करते हुए भक्ति और सेवा में जीवन लगाना चाहिए,76 वर्ष के पश्चात संन्यास आश्रम का समय होता है, जिसमें मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर भगवान के ध्यान,नाम-जप,कीर्तन और कथा श्रवण में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देना चाहिए। कथा के दौरान देव और असुर के स्वभाव का भी सुंदर वर्णन किया गया। जो दूसरों के हित में कार्य करते हैं, वे देवतुल्य होते हैं, जबकि दूसरों का अधिकार छीनने वाले असुर कहलाते हैं। इस प्रसंग में भक्तराज प्रह्लाद,महाराज बलि,भगवान वामन,राजा अम्बरीष,दुर्वासा ऋषि,श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य चरित्रों का भावपूर्ण वर्णन कर श्रोताओं को भक्ति रस में सराबोर कर दिया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही, जिन्होंने कथा का श्रवण कर अपने जीवन को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण किया। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना, बल्कि समाज को सही दिशा देने वाला प्रेरणास्रोत भी सिद्ध हो रहा है।

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