संस्कृत शब्दों में भारतीय विरासत का विराट प्रतिबिम्बः 

 

वाराणसी में ग्रंथ लोकार्पण समारोह सम्पन्न।

 

वाराणसी। इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (क्षेत्रीय केन्द्र, वाराणसी) द्वारा 22 अप्रैल 2026 को एक गरिमामय कार्यक्रम में “INDIAN HERITAGE AS REFLECTED IN SANSKRIT WORDS AND DESCENDANTS” शीर्षक ग्रन्थ का भव्य लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन केन्द्र के सभागार में अपराह्ण 3ः00 बजे से प्रारम्भ हुआ, जिसमें देशभर के प्रतिष्ठित विद्वानों, शोधार्थियों एवं संस्कृत-प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का शुभारम्भ परम्परानुसार दीप प्रज्ज्वलन एवं पाणिनि कन्या महाविद्यालय की ऋषिकाओं द्वारा वैदिक एवं पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रो० सदाशिव कुमार द्विवेदी (संस्कृत विभागाध्यक्ष, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) उपस्थित रहे। अध्यक्षता प्रो० विजयशंकर शुक्ल (निदेशक, पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी) ने की, साथ ही शुभाशीर्वचन डॉ० दयानिधि मिश्र द्वारा प्रदान किया गया। कार्यक्रम में ग्रंथ-लेखक राष्ट्रपति सम्मान से पुरस्कृत, डॉ० सुद्युम्न आचार्य भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

अपने स्वागत उद्बोधन में कला केन्द्र के निदेशक डॉ. अभिजित् दीक्षित ने ग्रंथ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कृति भारतीय सांस्कृतिक विरासत की गहनता को संस्कृत शब्दों एवं उनकी सुदीर्घ परम्पराओं के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह ग्रंथ न केवल भाषिक अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत है, अपितु भारतीय परम्परा, दर्शन और सांस्कृतिक निरंतरता का सशक्त दस्तावेज भी है। तत्पश्चात् ग्रंथ-लेखक डॉ० सुद्युम्न आचार्य ने अपने संबोधन में इस कृति की रचना-प्रक्रिया, प्रेरणा एवं उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका प्रयास रहा है कि संस्कृत के माध्यम से भारतीयता के मूल तत्वों को पुनः सामने लाया जाए। उन्होंने बताया कि यह ग्रंथ वर्षों के शोध, अध्ययन एवं संग्रह का परिणाम है। डॉ० दयानिधि मिश्र ने यह विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि ग्रंथ भारतीय भाषिक परम्परा के विकास को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा एवं यह सम्पूर्ण विश्व में शब्द की यात्रा के माध्यम से भारत की ख्याति को रेखांकित करेगा।

मुख्य अतिथि प्रो० सदाशिव कुमार द्विवेदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की आत्मा है। इस ग्रंथ के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार संस्कृत शब्दावली ने विभिन्न भारतीय भाषाओं को समृद्ध किया है। उन्होंने इस प्रकार के शोध कार्यों को भारतीय ज्ञान प्रणाली के पुनरुत्थान के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो० विजयशंकर शुक्ल ने ग्रंथ की विद्वत्तापूर्ण संरचना की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक भारतीय सांस्कृतिक अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति का गहरा सम्बन्ध होता है, और यह कृति उसी सम्बन्ध को वै

ज्ञानिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्तुत करती है।

इस अवसर पर समुपस्थित विद्वानों में प्रो० शरदिन्दु त्रिपाठी, समन्वयक, भारत अध्ययन केन्द्र, आचार्या नन्दिता शास्त्री (प्राचार्या), डॉ० प्रीति विमर्शिनी (पाणिनि कन्या महाविद्यालय), डॉ० प्रवीण गटला (भाषाविज्ञान विभाग, बीएचयू), डॉ० सुखदा (आईआईटी), डॉ० प्रभाकर उपाध्याय (प्राचीन इतिहास, पुरातत्व एवं कला विभाग), डॉ० प्रियंका (भारत कला भवन) को माल्य, शॉल एवं स्मृति.चिह्न प्रदान किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत , डॉ० प्रवीण गटला (भाषाविज्ञान), डॉ० सुखदा (आईआईटी) द्वारा ग्रन्थपरक वक्तव्य भी प्रस्तुत किए गए, जिनमें विद्वानों ने पुस्तक की विषयवस्तु, शोध-पद्धति एवं उसके महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों एवं शोधार्थियों ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए इस प्रकार के आयोजनों को भारतीय ज्ञान परम्परा के संवर्धन हेतु अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के ग्रंथ न केवल अकादमिक जगत को समृद्ध करते हैं, बल्कि समाज में सांस्कृतिक जागरूकता भी उत्पन्न करते हैं। समारोह का संचालन अत्यंत सुसंगठित एवं प्रभावशाली ढंग से कला केन्द्र के परियोजना समन्वयक, डॉ. रजनीकान्त त्रिपाठी द्वारा किया गया तथा अंत में संस्कृत विभाग, कला संकाय, बीएचयू के डॉ. शिवलोचन शाण्डिल्य के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। समग्रतः यह आयोजन विद्वत्ता, परम्परा और सांस्कृतिक चेतना का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा, जिसने वाराणसी की सांस्कृतिक धारा को और अधिक समृद्ध किया।

Related News

7775078405805895489

Lates Post

61
Poll

भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा?

Scroll to Top