समान अवसर, निःशुल्क शिक्षा और चिकित्सा ही विकसित भारत की मजबूत नींव होगी

वाराणसी। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सामाजिक न्याय और समान अवसर की चर्चा सदैव होती रही है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग तथा सामान्य वर्ग— सभी समुदायों के युवाओं के भविष्य का सबसे बड़ा आधार शिक्षा और स्वास्थ्य है। आज आवश्यकता इस बात की है कि केवल आरक्षण तक सीमित सोच से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें प्रत्येक गरीब और जरूरतमंद परिवार को आर्थिक सहयोग, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और निःशुल्क चिकित्सा उपलब्ध हो सके।
आज देश में लाखों प्रतिभाशाली विद्यार्थी केवल आर्थिक अभाव के कारण अपनी प्रारंभिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा अथवा चिकित्सा शिक्षा पूरी नहीं कर पाते। कई परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई और इलाज के लिए कर्ज में डूब जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्रतिभा और मेहनत होने के बावजूद युवा अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाते। यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्र की मानव शक्ति के कमजोर होने का विषय है।
विशेष रूप से उन परिवारों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो जाती है, जहाँ घर के कमाने वाले मुखिया की अचानक मृत्यु हो जाती है। ऐसे समय में परिवार आर्थिक संकट में बिखर जाता है। बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है, महिलाओं के सामने जीवन यापन का संकट खड़ा हो जाता है और पूरा परिवार भविष्य को अंधकारमय महसूस करने लगता है। यदि सरकार शिक्षा और चिकित्सा को अधिक सुलभ तथा निःशुल्क बनाए, तो ऐसे परिवारों को जीवन में पुनः खड़े होने की शक्ति मिल सकती है। यह केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि समाज की नारी शक्ति और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित करने का राष्ट्रीय दायित्व है।
आज भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यदि इस युवा शक्ति को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सुरक्षा और समान अवसर प्राप्त होंगे, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान और मानव संसाधन के क्षेत्र में भी विश्व का नेतृत्व कर सकता है।
समय की मांग है कि सरकार, समाज और नीति-निर्माता मिलकर ऐसी व्यवस्था की ओर आगे बढ़ें जहाँ
“समान अवसर + गुणवत्तापूर्ण शिक्षा + आर्थिक सहयोग + निःशुल्क चिकित्सा”
को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बनाया जाए। यही एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत की वास्तविक दिशा होगी।
सरकार द्वारा आरक्षण व्यवस्था सामाजिक संतुलन और ऐतिहासिक असमानता को दूर करने के उद्देश्य से लागू की गई थी, जिसका अपना महत्व है। लेकिन वर्तमान समय में यह भी आवश्यक है कि शिक्षा में आर्थिक रूप से कमजोर प्रत्येक वर्ग को पर्याप्त सहयोग मिले, ताकि समाज का कोई भी प्रतिभाशाली बच्चा केवल पैसों की कमी के कारण पीछे न रह जाए। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आधुनिक संसाधन सभी को समान रूप से उपलब्ध होंगे, तो समाज में वास्तविक समानता और प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तथा चिकित्सा सेवाओं तक आम नागरिक की आसान और निःशुल्क पहुँच सुनिश्चित की जाए। विकसित देशों की तरह भारत में भी शिक्षा और स्वास्थ्य को मूल अधिकार की भावना के साथ लागू किया जाना चाहिए। जब परिवार शिक्षा और इलाज के भारी खर्च से मुक्त होंगे, तभी वे तनावमुक्त होकर अपने कौशल, तकनीकी क्षमता और शोध कार्यों पर ध्यान दे पाएंगे। इससे देश में नवाचार, तकनीकी विकास, व्यापारिक मजबूती और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।