जन औषधि केंद्रों पर ‘नो पैड’ और स्कूलों में निस्तारण की कमी पर छलका 1000 से अधिक लड़कियों का दर्द;

वाराणसी, 28 मई विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस की पूर्व संध्या पर डॉ. शम्भुनाथ सिंह रिसर्च फाउंडेशन द्वारा “चलो वहां जरूरत है जहां” अभियान के तहत वाराणसी की 30 शहरी बस्तियों जिसमे 9 बाल अधिकार संस्था क्राई के सहयोग से तथा अन्य सहयोगी संस्था के सहयोग से चलाये जा रहे कार्यक्रम वाली बस्तियों में जागरूकता पदयात्रा निकाली गई। अभियान में 1000 से अधिक किशोरियों ने हिस्सा लेकर माहवारी पर खुलकर संवाद कर प्रेरक संदेश दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए संस्था की कार्यक्रम निर्देशिका ने कहा कि माहवारी स्वच्छता आज भी समाज में उपेक्षित विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाएं बेहद सराहनीय हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बिचौलियों और अव्यवस्थाओं के कारण वास्तविक लाभार्थियों तक उनका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने कहा,
“हमारा उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना नहीं, बल्कि सरकारी की योजनाओं को हर जरूरतमंद किशोरी तक पहुंचाना है, ताकि कोई भी लड़की संसाधनों की कमी के कारण शिक्षा या स्वास्थ्य से वंचित न रहे।” संस्था की परियोजना प्रबंधक राजश्री ने बताया कि संस्था द्वारा 500 किशोरियों से साक्षातकार के उपरांत गंभीर तथ्य सामने आए।
सर्वे में शामिल 95 प्रतिशत लड़कियों ने बताया कि जन औषधि केंद्रों से हम किशोरियों को खाली हाथ लौटना पड़ता है।
वहीं 50 प्रतिशत किशोरियों ने स्वीकार किया कि स्कूलों में इस्तेमाल किए गए पैड के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था न होने के कारण वे माहवारी के दिनों में स्कूल जाने से कतराती हैं।
इन आंकड़ों ने माहवारी स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया। इन्ही के साथ सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिले की पूर्व की अपेक्षा वर्तमान में किशोरियो के झिझक में कमी आई है।
अभियान सहयोगी दीक्षा सिंह ने बताया कि संस्था वाराणसी की 39 बस्तियों में किशोर-किशोरी समूहों के साथ लगातार कार्य कर रही है। इस अभियान में ‘बालपहरुआ किशोरी समूह’ की लड़कियों ने अपने परिजनों के साथ हाथों में तख्तियां लेकर जागरूकता रैली निकाली और लोगों को माहवारी से जुड़े मिथकों को तोड़ने का संदेश दिया।
पदयात्रा के बाद आयोजित संवाद शिविर में किशोरियों ने बिना किसी झिझक के माहवारी से जुड़े सवाल पूछे। संस्था के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया और यह संदेश दिया कि ‘पीरियड्स’ कोई शर्म या बीमारी नहीं, बल्कि सामान्य जैविक प्रक्रिया है। यह अभियान अमरपुर, दानियालपुर, पुरानापुल, रसुलगढ़, सरायमोहना समेत कई बस्तियों में आयोजित किया गया।