बच्चों के कंधों पर शिक्षा के नाम पर इतना सारा बोझ विद्यार्थियों के प्रतिभा का क्षरण कर रहे हैं।

शिक्षा के नाम पर बच्चों का समय, ऊर्जा और आत्मविश्वास बर्बाद क्यों।

अमित राय

वाराणसी।विद्यार्थी केवल परीक्षा देने की मशीन नहीं हैं; वे राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं। यदि उनकी रुचि, क्षमता और प्रतिभा के अनुसार शिक्षा दी जाए तो भारत विश्व का सबसे सक्षम और नवाचारी राष्ट्र बन सकता है।अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था को “एक जैसा सब पर लागू” करने के बजाय “हर विद्यार्थी की क्षमता के अनुसार” बनाया जाए।

अनावश्यक विषयों का बोझ कम करके, कौशल आधारित और रुचि आधारित शिक्षा लागू करना ही भविष्य के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

क्योंकि जब शिक्षा विद्यार्थियों की प्रतिभा के अनुरूप होगी, तभी भारत वास्तव में ज्ञान, कौशल और नवाचार की महाशक्ति बन सकेगा।भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यहाँ करोड़ों विद्यार्थी देश का भविष्य, शक्ति और पूंजी माने जाते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि जिस शिक्षा व्यवस्था से देश का भविष्य निर्माण होना चाहिए, वही व्यवस्था अनेक स्थानों पर विद्यार्थियों की प्रतिभा, समय और ऊर्जा का क्षरण करती दिखाई देती है। आज देश में अलग-अलग शिक्षा बोर्ड, भिन्न पाठ्यक्रम, असमान अवसर और अनावश्यक विषयों का बोझ विद्यार्थियों को भ्रमित कर रहा है। एक ओर सरकार “स्किल इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” की बात करती है, वहीं दूसरी ओर विद्यालयी शिक्षा में अभी भी ऐसी अनेक व्यवस्थाएँ हैं जो विद्यार्थियों की वास्तविक क्षमता और रुचि के अनुरूप नहीं हैं। भारत में लाखों युवा वर्षों तक कठिन परिश्रम करके डिग्रियाँ प्राप्त करते हैं। परिवार अपनी जमा पूंजी खर्च करता है, माता-पिता सपने देखते हैं कि उनका बेटा या बेटी पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनेगा। लेकिन दुखद वास्तविकता यह है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी डिग्री लेने के बाद भी बेरोजगार रह जाते हैं।

फिर वही युवा नौकरी की तलाश में दर-दर भटकते हैं।

कभी भर्ती निकलने की प्रतीक्षा, कभी परीक्षा स्थगित, कभी पेपर लीक, कभी परिणाम में देरी — और अंततः सड़कों पर आंदोलन।देश में अनेक स्थानों पर यह दृश्य सामान्य हो चुका है कि हाथों में डिग्री लिए युवा सरकार से रोजगार की मांग करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं।

यह केवल युवाओं की पीड़ा नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता का प्रमाण है।सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि शिक्षा के बाद भी युवा आत्मनिर्भर नहीं बन पा रहा, तो उस शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या रह गया।कक्षा 08 तक सामान्य शिक्षा, उसके बाद रुचि आधारित अध्ययन आवश्यक। बचपन में सभी विषयों का सामान्य ज्ञान देना आवश्यक है ताकि विद्यार्थी दुनिया को समझ सके। लेकिन कक्षा 08 तक मूलभूत शिक्षा देने के बाद विद्यार्थियों की रुचि और क्षमता के अनुसार उन्हें विशेष विषयों की ओर मार्गदर्शन मिलना चाहिए। विद्यार्थियों की प्रतिभा पहचानने हेतु नियमित करियर काउंसलिंग हो।

ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच की दूरी कम की जाए।

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