दो और ढाई दशक से एक ही जनपद और एक ही रेंज पर खत्म कर रहे है नौकरी

वन विभाग में कार्यरत कर्मियों के नही होते है स्थानांतरण
कई डीएफओ आए और चले गए लेकिन अंगद के पांव की तरह जमे कर्मचारियों को सरकारें टस से मस नही कर सकी
वन विभाग में स्थानांतरण नीति का 10% का कोई मतलब नही,यहा स्वहित को सर्वोपरि का सिद्धांत माना जाता है प्रशासन को ही नही शासन तक को वन विभाग की उस हकीकत से रूबरू करवाने का प्रयास है जहां योगी महराज की जीरो टांलरेंस को आलमारी के लांकर में बंद करके चाभी को अंधेरे कुंए में फेक दिया है,शायद यह हरियाली के साथ गहरी साजिश है,जहां आरे और नाजयाज आरा मशीने बगैर आवाज के एक वृक्ष मां के नाम की परिभाषा को कुल्हाड़ी के वार से धराशाई कर रहे है,उत्तर प्रदेश की बाबा बुलडोजर सरकार का बुलडोजर सुल्तानपुर के वन विभाग की तरफ शायद रूख करने से गुरेज करता है,वर्ना पिछले दो-तीन दशक से जिले और एक ही रेंज पर नौकरी पूरी करने वालों को प्रदेश के अंतिम छोर तक का फेरा लगाना पड़ सकता था,आश्चर्य होता है की कई सरकारे आई-गई न जाने कितने डीएफओ आए और गए लेकिन बर्षो-बरस से जमे अंगद पांव की तरह साहबों को कोई हिला न सका,शायद यही वजह है की जिले में बेतहाशा अवैध आरा मशीने और हरियाली के दुश्मनों के गठजोड़ ने वन विभाग को हमेशा सुर्खियों में ही रखा,एक बड़ा कारण और भी रहा की विभाग ने तमाम शिकायतों के बाद भी मामले को संज्ञान में नही लिया,बस यही वजह रही की बरसों-बरस से जमे साहबान और हरियाली को नेस्तनाबूद करने वालों के बीच खून का रिश्ता भले ही नही है,लेकिन आर्थिक संबंध जरूर गहरे बने हुए है,बड़े आश्चर्य की बात है की एक जनपद, एक रेंज पर पूरी नौकरी बिताने वालों को न शासन ने कभी संज्ञान लिया और न ही वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने,अन्यथा शासन की स्थानांतरण नीति का इतना क्रूर मजाक जनपद में शायद ही होता,हद तो तब हो गई जब सरकार की स्थानांतरण नीति से उलट मौजूदा डीएफओ ने 20 प्रतिशत बताया जबकि सरकार का मानक संभवतः10% ही है,अब ऐसे में क्या समझा जाए।वैसे सूत्रों की माने तो विभाग में वर्षो से जमे कर्मियों की मंडल व शासन स्तर पर 10% की सूची भी नही जाती,सूत्र बताते है की सत्र 2023/24 और 2024/25 में भी कोई सूची स्थानीय स्तर से नही भेजी गई,डीएफओ अमित सिंह का कहना है की स्थानांतरण करना मेरे अधिकार क्षेत्र में नही है,यदि किसी भी कर्मचारी का स्थानांतरण होगा तो उसको मेरे तरफ से रिलीव किया जाएगा,आइये एक नज़र बरसों-बरस से जमे हुए वन विभाग के कर्मियों पर डालते है।सबसे ऊपर है सोभनाथ वन दारोगा डिवीजन कार्यालय में कोर्ट केस देखते है,लगभग 28 साल से इसी जिले में तैनात है,दूसरे नंबर पर है राकेश चौहान वन दारोगा पिछले 25 साल से अखंड नगर/कादीपुर में जमे हुए है,तीसरे नंबर पर आते है कमलेश सिंह वन दारोगा सदर रेंज में लगभग 22 बरस से मौजूद है,चौथे नंबर पर आते है रमेश बहादुर सिंह वन दारोगा जयसिहपुर रेंज 20 साल से अंगद पांव की तरह जमे हुए है,पांचवें नंबर पर आते है वन दारोगा दीपक सिंह कादीपुर रेंज लगभग 17 साल से इसी जनपद में अपनी सेवाएं दे रहे है, दारोगा ही नही रेंजर भी लंबे समय से जिले में कार्यरत है,चंद्र प्रकाश रेंजर जयसिहपुर लगभग 18 साल से तैनात है,वही डिप्टी रेंजर में अतुल सिंह लंभुआ रेंज लगभग 18 वर्षों से जिले में है तो वहीं डीके यादव डिप्टी रेंजर जिले में लगभग 15 साल से तैनात है,सूत्र बताते है की बीते वर्ष डीके यादव का स्थानांतरण गैर जनपद हो गया था,दोबारा पुनः सुल्तानपुर जनपद में इन्हें पोस्टिंग मिली है।तो यह है वन विभाग सुल्तानपुर की वह व्यवस्था जहां शंका होना कोई आश्चर्य की बात नही बल्कि बाबा योगी आदित्यनाथ सरकार की उस नीति पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है की जिस व्यवस्था के लिए योगी सरकार देश में जानी जाती है तो सुल्तानपुर वन विभाग में ऐसी चूक कैसे हो रही है।
क्रमशः