समतामूलक उच्च शिक्षा भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण।

आज दिनांक 06 जून 2026 को अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी तथा विनोवा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग, झारखंड के संयुक्त तत्वावधान में छः दिवसीय समतामूलक उच्च शिक्षा भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण” विषयक संकाय विकास कार्यक्रम (FDP) का समापन विनोवा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग परिसर में हुआ। शिक्षा में उत्कृष्टता, इक्विटी तथा विस्तार आवश्यक है परंतु ‘इक्विटी’ अर्थात हिस्सेदारी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। उक्त बातें विश्वविद्यालय के पूर्व प्रतिकूलपति प्रो. अंजनी कुमार श्रीवास्तव ने शनिवार को कही। वह स्वामी विवेकानंद सभागार में 6-दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम के समापन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। भगवान बिरसा मुंडा का नारा ‘अबुआ दिसुम, अबुआ राज’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के बिना हमारी कोई पहचान नहीं है। परंतु जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ मिला के आगे बढ़ेंगे तो यह हमें ख्याति दिलाएगा। ऐसा करने पर हम फिर से विश्व को नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम हो सकते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विनोवा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग के कुलपति प्रो. चंद्र भूषण शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल पुराण और उपनिषद जैसे ग्रंथ तक सीमित नहीं है। इसमें महात्मा गांधी और बाबा साहेब अंबेडकर जैसे आधुनिक चिंतकों के विचार भी समाहित हैं। बापू की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि जब तक किसी आयोजन से अंतिम व्यक्ति लाभान्वित नहीं होता है तब तक वह आयोजन को सफल नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा की जरूरी नहीं कि एक जैसा पाठ्यक्रम सभी के लिए हो, पाठ्यक्रम निर्धारण के समय अंतिम विद्यार्थी की जरूरत को भी ध्यान में रखें। जो भारतीय ज्ञान उस विद्यार्थी के लिए उपयुक्त होगा उसे उससे परिचित कराए। कुलपति ने आगे कहा कि वह चाहते हैं की विश्वविद्यालय के शिक्षक पश्चिम की व्यवस्था और हमारी अपनी भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित व्यवस्था, दोनों को ठीक से जाने और उसके बाद अपनी समझ बनाएं। उन्होंने 6-दिवसीय कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूर्ण करने वाले प्रतिभागियों को बधाई दी। कहा कि आईयूसीटी के साथ मिलकर अगले चरण में शोध पर आधारित ऐसे आयोजन किए जाएंगे। यह भी कहा कि यदि संभव हुआ तो विश्वविद्यालय के शोधार्थियों को भी उसमें शामिल किया जाएगा। विशिष्ट अतिथि संकाय प्रमुख (शैक्षणिक एवं शोध), आईयूसीटी के प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने कहा इस समापन सत्र को एक नई शुरुआत समझे। इस बार अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केन्द्र, वाराणसी से हम यहां आए हैं अगली बार विनोबा भावे विश्वविद्यालय भी हमारे यहां पहुंचे। उन्होंने 6-दिवसीय कार्यक्रम में भाग लेने वाले प्रतिभागियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनमें सीखने की मानसिकता थी और वह काफी विनम्र थे। उन्होंने इस कार्यक्रम के सार को बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमें ‘दिशा’ देगी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से हमें ‘क्षमता’ की प्राप्ति होगी, इक्विटी हमारे ‘उद्देश्य’ को स्पष्ट करेगा, शोध हमें समस्याओं का ‘समाधान’ बताया, सरकार हमें ‘शक्ति’ देगी और शिक्षण इसे ‘अर्थ’ प्रदान करेगा।

इस पहल के अंतर्गत झारखंड के रामगढ़, गिरिडीह, कोडरमा तथा चतरा जिलों में समानांतर रूप से कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में 200 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम के निदेशक प्रो. आशीष श्रीवास्तव, संकाय प्रमुख (शैक्षणिक एवं शोध), आईयूसीटीई तथा प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह, सीसीडीसी विभावि, हजारीबाग, झारखंड हैं, जबकि इसका समन्वयन डॉ. राजा पाठक, सहायक आचार्य, आईयूसीटीई, डॉ. दीप्ति गुप्ता, सहायक आचार्य, आईयूसीटीई, एवं डॉ अरुण कुमार मिश्रा, विभावि, हजारीबाग द्वारा किया जा रहा है। इससे पूर्व विश्वविद्यालय के सीसीडीसी तथा इस कार्यक्रम के निदेशक प्रो मिथिलेश कुमार सिंह पूरे कार्यक्रम का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। प्रतिभागियों में डॉ मनीष कुमार झा तथा डॉ कुमारी भारती सिंह आदि अध्यापकों ने अपने अनुभवों को साझा किया। कुलसचिव प्रो सुरेंद्र कुमार कुशवाहा ने स्वागत संबोधन प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम के संयोजक तथा पीएम उषा के निदेशक डॉ. अरुण कुमार मिश्रा ने कार्यक्रम का संचालन सह धन्यवाद ज्ञापन का दायित्व संभाला।

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