छः दिवसीय समतामूलक उच्च शिक्षा: भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण।

 

11 जून 2026 को अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (आईयूसीटीई), वाराणसी तथा विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग, झारखंड के संयुक्त तत्वावधान में छः दिवसीय

समतामूलक उच्च शिक्षा: भारतीय ज्ञान परंपरा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण”* विषयक संकाय विकास कार्यक्रम (FDP) का समापन रामगढ़ महाविद्यालय, रामगढ़, झारखंड परिसर में हुआ।

समापन समारोह को ऑनलाइन संबोधित करते हुए विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति सह कार्यक्रम के संरक्षक प्रोफेसर चंद्रभूषण शर्मा ने कहा कि दुनिया के साथ तेज दौड़ कर ही हम भारत को आगे ले जा सकते हैं जिन लोगों ने 80 के दशक में कंप्यूटर साइंस पढ़ा आज वह अच्छे-अच्छे जगह पर कार्य कर रहे हैं। आज हम जितना जल्दी ए आई से काम लेना सीखेंगे और उसे विद्यार्थियों को सिखाएंगे उतना जल्दी हमारे बच्चे शिखर पर पहुंचेंगे। हम शिक्षकों का दो ही गुण हो सकता है कि कितना अच्छा बोल सकते हैं और कितना अच्छा लिख सकते हैं, अच्छा से अभिप्राय ज्ञानवर्धन बातों से है। कक्षा में ज्ञानवर्धन व्याख्यान देने और ए आई के सहायता से शिक्षण को लाभदायक बनाने के साथ साथ निरंतर शोध करने और उसे स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित करने की आवश्यकता है।

आज मुख्य संसाधन सेवी के रूप में इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर टीचर एजुकेशन, वाराणसी के प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने और विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग से पी एम उषा के नोडल ऑफिसर डॉ अरुण कुमार मिश्रा ने व्याख्यान दिए।

प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने अपने व्याख्यान में भारतीय उच्च शिक्षा की अकादमिक संस्कृति, सुशासन और शोध की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थान की पहचान उसके शिक्षकों, कार्य संस्कृति, दृष्टि और मूल्यों से बनती है। बेहतर शासन का अर्थ अधिक नियंत्रण नहीं, बल्कि जवाबदेही के साथ स्वायत्तता है। उन्होंने कहा कि शासन केवल नियमों और फाइलों का विषय नहीं, बल्कि व्यवहार और नेतृत्व का प्रतिबिंब है। तकनीक अच्छे मानवीय संबंधों का विकल्प नहीं हो सकती तथा संस्थानों को बैठक संस्कृति और अनावश्यक औपचारिकताओं से बाहर निकलकर शोध, नवाचार और संकाय विकास पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, जनजातीय ज्ञान पर आधारित शोध तथा नेतृत्व, प्रबंधन और सुशासन की समन्वित भूमिका पर विशेष बल दिया।

डॉ. अरुण कुमार मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) की सफलता सभी हितधारकों के सामूहिक सहयोग और समन्वय पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि जब शिक्षक, विद्यार्थी, प्रशासन और समाज मिलकर एक साझा उद्देश्य के साथ कार्य करेंगे, तभी शिक्षा व्यवस्था सही दिशा में आगे बढ़ेगी और निर्धारित लक्ष्यों की प्रभावी रूप से प्राप्ति संभव हो सकेगी। उन्होंने आगे कहा कि इस कार्यक्रम का औपचारिक समापन हो गया किंतु कार्य को व्यावहारिक रूप देने की शुरुआत अब होगा। इसे व्यावहारिक रूप देने के लिए हमें अपनी जानकारी और शक्ति के अनुसार कार्य करना चाहिए।

धन्यवाद ज्ञापन जिला समन्वयक सह महाविद्यालय के प्राचार्या डॉ रत्ना पाण्डेय ने किया। उन्होंने धन्यवाद देने से पूर्व कहा कि हम शिक्षकों को अपने लिए नहीं बल्कि विद्यार्थियों के भला के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। तब कुछ न कुछ बदलेगा। क्योंकि हम राष्ट निर्माता हैं अतः राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से कार्य करना चाहिए। इस कार्यक्रम में रामगढ़ जिले के सभी महाविद्यालय के शिक्षकों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया और भरपूर लाभ उठाया। अंत में प्रतिभागियों ने फीडबैक देते हुए इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर टीचर एजुकेशन, वाराणसी, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग और रामगढ़ कॉलेज रामगढ़ का आभार व्यक्त किया।कार्यक्रम के निदेशक प्रो. आशीष श्रीवास्तव, संकाय प्रमुख (शैक्षणिक एवं शोध), आईयूसीटीई तथा प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह, सीसीडीसी विभावि, हजारीबाग, झारखंड हैं, जबकि इसका समन्वयन डॉ. राजा पाठक, सहायक आचार्य, आईयूसीटीई, डॉ. दीप्ति गुप्ता, सहायक आचार्य, आईयूसीटीई, एवं डॉ. अरुण कुमार मिश्रा, विभावि, हजारीबाग द्वारा किया जा रहा है।

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